जबेरा पंचायत में जॉब कार्ड का डेटा गायब! रिकॉर्ड डिलीट हुआ या भ्रष्टाचार के निशान मिटाने की कोशिश? 783 प्रधानमंत्री आवास के बीच बड़ा सवाल—जब जॉब कार्ड का रिकॉर्ड ही गायब, तो आवास योजना का लाभ कैसे मिला?

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रिपोर्टर अमित शर्मा (8349348053)
जबेरा। दमोह जिले की जनपद पंचायत जबेरा की ग्राम पंचायत जबेरा में मनरेगा से जुड़े जॉब कार्ड के डेटा के कथित तौर पर गायब होने का मामला सामने आने के बाद पंचायत व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि डेटा गायब कैसे हुआ, बल्कि असली सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ किसने की और किसके आदेश पर की गई?
मनरेगा के जॉब कार्ड महज कोई सामान्य कागज या कंप्यूटर की एंट्री नहीं हैं। ये ग्रामीण मजदूरों के रोजगार, मजदूरी, कार्यदिवस और भुगतान से जुड़े महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड हैं। ऐसे में यदि पंचायत स्तर पर इनका डेटा वास्तव में डिलीट हुआ है, तो इसे महज तकनीकी खराबी बताकर मामला दबाना गंभीर सवालों को जन्म देगा।
सचिव कल्लू यादव की भूमिका पर उठे सवाल
ग्राम पंचायत जबेरा के सचिव कल्लू यादव की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि पंचायत में जॉब कार्ड का डेटा किस प्रक्रिया के तहत हटाया गया?
अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक था, तो सरकारी रिकॉर्ड गायब होने की नौबत क्यों आई?
जॉब कार्ड गायब तो 783 आवास कैसे?
मामले का सबसे बड़ा पेच प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत जबेरा में 783 प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े प्रकरण बताए जा रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि मनरेगा से संबंधित जॉब कार्ड का डेटा कथित रूप से उपलब्ध नहीं है, तो इन आवासों से जुड़े पात्र हितग्राहियों का रिकॉर्ड कैसे संचालित हुआ? क्या संबंधित हितग्राहियों के जॉब कार्ड मौजूद थे? क्या उनका डेटा किसी दूसरे रिकॉर्ड या सिस्टम में उपलब्ध है?
अगर जॉब कार्ड का रिकॉर्ड ही गायब है, तो 783 आवासों की प्रक्रिया किस रिकॉर्ड के आधार पर आगे बढ़ी?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब पंचायत से लेकर जनपद स्तर तक जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
मजदूरी का भुगतान हुआ तो रिकॉर्ड कहां है?
मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को रोजगार और मजदूरी का भुगतान किया जाता है। वर्षों से पंचायत में हुए मनरेगा कार्यों, मजदूरों की उपस्थिति, कार्यदिवस और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड सरकारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
कहीं ऐसा तो नहीं कि रिकॉर्ड के गायब होने से पुराने कार्यों और भुगतानों की जानकारी प्रभावित हो रही हो? यह सवाल गंभीर है, लेकिन इसका सच केवल तकनीकी जांच और सरकारी रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आ सकता है।
अब सवाल सीधे जिम्मेदार अधिकारियों से
जबेरा पंचायत के मामले में जांच एजेंसी को सबसे पहले यह पता करना चाहिए कि डेटा कब, किस यूजर आईडी से और किस स्तर से हटाया गया।
मामला तकनीकी गड़बड़ी का
या रिकॉर्ड छिपाने का?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि डेटा जानबूझकर भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड मिटाने के लिए हटाया गया। लेकिन डेटा गायब होने की बात सही है तो इसकी निष्पक्ष तकनीकी जांच बेहद जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक पंचायत के कंप्यूटर रिकॉर्ड का नहीं है। सवाल उन गरीब मजदूर परिवारों के अधिकारों का भी है, जिनकी मजदूरी और रोजगार का हिसाब इन्हीं सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज रहता है।
अब देखना यह है कि जनपद पंचायत जबेरा और जिला प्रशासन इस मामले को तकनीकी त्रुटि बताकर टालता है या डेटा की डिजिटल फॉरेंसिक जांच कर वास्तविक जिम्मेदार तक पहुंचता है।

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