रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह/हटा। जुआ पकड़ने की कार्रवाई में पुलिस की भूमिका अपराधियों को पकड़ने और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि मौके से बरामद सामग्री और नकदी की जब्ती में लेनदेन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन हटा थाना क्षेत्र के ग्राम भटिया में जुआ पकड़ने की कार्रवाई के बाद सामने आए एक दावे ने पुलिस की जब्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने पांच लोगों को जुआ खेलते पकड़ने और मौके से महज 4,450 रुपये नकद तथा 52 ताश के पत्ते जब्त करने का दावा किया है, जबकि पकड़े गए आरोपियों में शामिल उमेश सेन ने जुआ फड़ पर 70 से 80 हजार रुपये होने की बात कही है। अब सवाल यह है कि यदि फड़ पर इतनी बड़ी रकम मौजूद थी तो पुलिस की जब्ती में सिर्फ 4,450 रुपये ही कैसे दर्ज हुए?
70-80 हजार की बात, जब्ती में सिर्फ 4,450 रुपये!
मामला 2 नवंबर का है। पुलिस के अनुसार, देहात भ्रमण के दौरान सहायक उपनिरीक्षक अरविंद राय को मुखबिर से सूचना मिली कि ग्राम भटिया के बाजार मैदान में स्ट्रीट लाइट के नीचे कुछ लोग ताश के पत्तों पर रुपये-पैसों का दांव लगाकर जुआ खेल रहे हैं। सूचना के आधार पर पुलिस टीम गवाहों के साथ मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर पांच लोगों को पकड़ लिया। पुलिस ने कार्रवाई में 4,450 रुपये नकद और 52 ताश के पत्तों की जब्ती दर्शाई। पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों में बलदाऊ उर्फ बलू अहिरवार (32), पुरुषोत्तम लोधी (29), लोकेन्द्र अहिरवार (23), आशीष अहिरवार (20) और उमेश सेन (30), सभी निवासी ग्राम भटिया शामिल हैं। इनके विरुद्ध जुआ एक्ट की धारा 13 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। जमानती अपराध होने के चलते आरोपियों को नोटिस देकर न्यायालय में उपस्थित होने के लिए पाबंद किया गया।
सवाल सिर्फ रकम का नहीं, पूरी कार्रवाई की पारदर्शिता का है
इस मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि पुलिस की आधिकारिक जब्ती और आरोपी के दावे के बीच हजारों रुपये का अंतर सामने आ रहा है। 70 से 80 हजार रुपये की कथित रकम के मुकाबले 4,450 रुपये की जब्ती कई सवाल खड़े करती है। क्या पुलिस ने मौके पर मौजूद सभी लोगों और उनके पास उपलब्ध नकदी की विधिवत तलाशी ली थी? क्या फड़ पर रखी पूरी रकम की गिनती की गई थी? क्या जब्ती के दौरान सभी गवाह मौके पर मौजूद थे? और क्या जब्ती पंचनामे में वास्तविक स्थिति का पूरा उल्लेख किया गया है? यदि आरोपी का दावा गलत है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए, लेकिन यदि दावा सही है तो कथित शेष रकम का हिसाब सामने आना चाहिए। महज पुलिस का यह कहना कि मौके पर जितनी रकम मिली, उतनी ही जब्त की गई, उठ रहे सवालों का संपूर्ण जवाब नहीं माना जा सकता। ऐसे मामले में दस्तावेजी साक्ष्य और स्वतंत्र जांच ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।
एसआई की पूर्व कार्रवाइयों को लेकर भी चर्चाएं, जांच से ही साफ होगी तस्वीर
सूत्रों के अनुसार सहायक उपनिरीक्षक अरविंद राय की पूर्व की जुआ संबंधी कार्रवाइयों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर आरोप और चर्चाएं सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन वर्तमान मामले में जब्ती की रकम को लेकर उठे सवालों के बाद संबंधित अधिकारी की भूमिका और कार्रवाई की प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है। आखिर किसी भी कार्रवाई की विश्वसनीयता केवल आरोपियों की गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता से तय होती है।
टीआई का जवाब और कई अनुत्तरित सवाल
मामले में हटा थाना प्रभारी सुरेंद्र बेगी का कहना है कि गांव के लोगों से पूछताछ की गई है और मौके पर जब्त राशि थी, उसी की जब्ती बनाई गई है। पुलिस का पक्ष सामने आने के बाद अब जब्ती के दावे और पुलिस के जवाब के बीच हकीकत जानना जरूरी है। ऐसे में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि वे जब्ती पंचनामा, गवाहों के बयान, जांच के बयान और उपलब्ध अन्य गवाहीयों का परीक्षण कर निष्पक्ष जांच कराएं। आवश्यकता पड़ने पर मौके पर मौजूद लोगों से अलग-अलग पूछताछ भी की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की शंका की गुंजाइश न रहे। आखिरकार, सवाल सीधा है—यदि फड़ पर 70 से 80 हजार रुपये होने का दावा किया जा रहा है तो पुलिस की कार्रवाई में महज 4,450 रुपये ही क्यों दर्ज हुए? क्या जब्ती का दावा गलत है या फिर जब्ती की पूरी प्रक्रिया की दोबारा पड़ताल की जरूरत है? इसका जवाब केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। मामला अब सिर्फ जुआ पकड़ने की कार्रवाई का नहीं, बल्कि पुलिस की जब्ती प्रक्रिया पर जनता के मुताबिक और जवाबदेही का भी है।



