दमोह से शरद गर्ग की खास रिपोर्ट
दमोह। जिला पंचायत में पदस्थ जिला मध्यान्ह भोजन प्रभारी अधिकारी पीएस पांडेय एक बार फिर गंभीर आरोपों के चलते सुर्खियों में हैं। वर्ष 2015 में 13 हजार रुपए की रिश्वत लेते लोकायुक्त की कार्रवाई में पकड़े जाने और निलंबन के बाद उनकी उसी कार्यालय में बहाली हुई थी। अब करीब एक दशक बाद वसूली के आरोपों के बाद विभागीय व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला सिर्फ लोकायुक्त कार्रवाई तक सीमित नहीं है। अब स्व-सहायता समूहों से जुड़े लोगों की ओर से कार्रवाई का भय दिखाकर दबाव बनाने और कथित वसूली के आरोप भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि एमडीएम जैसी संवेदनशील योजना में आखिर निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
30 हजार की मांग का आरोप, 13 हजार पर ट्रैप
मौजूदा तत्कालीन मामले में वर्ष 2015 में लुहारी निवासी बलराम सिंह लोधी ने लोकायुक्त सागर में शिकायत की थी। शिकायत के अनुसार उनकी पत्नी के नाम से संचालित स्व-सहायता समूह के माध्यम से लुहारी मिडिल स्कूल में मध्यान्ह भोजन वितरित किया जाता है। आरोप है कि एक दिन भोजन नहीं बनने के मामले को लेकर समूह का अनुबंध निरस्त करने की धमकी देते हुए 30 हजार रुपए की मांग की गई। बाद में कथित तौर पर 20 हजार रुपए पर बात तय हुई। शिकायत की तस्दीक के बाद लोकायुक्त टीम ने कार्रवाई की और एमडीएम कार्यालय में 13 हजार रुपए लेते हुए पीएस पांडेय को पकड़ा। मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी।
2015 का ट्रैप, निलंबन और फिर उसी विभाग /कार्यालय में वापसी
2015 का पुराना प्रकरण एक बार फिर चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस समय 13 हजार रुपए की रिश्वत लेते लोकायुक्त कार्रवाई के बाद पीएस पांडेय का निलंबन हुआ था। बाद में उनकी बहाली हुई और वे पुनः उसी विभाग एवं कार्यालय में जिम्मेदारी संभालने लगे। अब सवाल सीधे हैं—लोकायुक्त कार्रवाई के बाद निलंबित अधिकारी की उसी विभाग एवं कार्यालय में बहाली किस आधार पर हुई? क्या पुराने प्रकरण की समीक्षा की गई थी? क्या महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने से पहले रिकॉर्ड खंगाला गया था?
ट्रैप के बाद फिर वसूली के आरोपों ने बढ़ाई बेचैनी
पूर्व की लोकायुक्त कार्रवाई के बाद अब स्व-सहायता समूहों से जुड़े लोगों की ओर से कार्रवाई का भय दिखाकर दबाव और कथित वसूली के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े किए हैं। सवाल यह भी है कि समूह संचालकों पर कार्रवाई नियमों के तहत हो रही है या कार्रवाई का भय कथित दबाव के माध्यम से वसूली के खेल को अंजाम दिया जा रहा है?
महिलाओं के पुराने आरोप भी फिर सवालों में
एमडीएम योजना से जुड़े स्व-सहायता समूहों की महिलाओं की ओर से पूर्व में भी दबाव और कथित वसूली को लेकर आवाज उठाए जाने की बात सामने आती रही है। अधिकारी से जुड़े कथित प्राइवेट व्यक्ति द्वारा वायरल व्हाट्सएप संदेशों और विभागीय हस्तक्षेप और कथित वसूली को लेकर भी सवाल उठे थे। अब लोकायुक्त कार्रवाई के पुराने शोर ने आरोपों को और हवा दे दी हैं। यदि शिकायतें गलत थीं तो जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई और यदि उनमें सच्चाई थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
ट्रैप → निलंबन → बहाली → फिर वसूली के आरोप!
पूरे घटनाक्रम की कड़ी कई सवाल खड़े करती है— 2015 में लोकायुक्त ट्रैप → निलंबन → उसी विभाग में बहाली → वर्षों बाद फिर रिश्वत मांगने का आरोप। यह सिलसिला सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह पदस्थापना, विभागीय निगरानी और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
अब प्रशासन की अग्निपरीक्षा
अब प्रशासन के सामने स्व-सहायता समूहों से जुड़ी शिकायतों की निष्पक्ष पड़ताल की चुनौती है। महिलाओ से जुड़े बयान, कथित कार्रवाई का भय दिखाकर वसूली, समूह निरस्तीकरण, नए समूह को काम मिलने, कथित लेन-देन, प्राइवेट रसोइया रखने और भोजन की मात्रा से जुड़े आरोपों की दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर जांच हो तो तस्वीर साफ हो सकती है। सवाल अब सिर्फ 13 हजार रुपए के ट्रैप का नहीं है। सवाल यह है कि लोकायुक्त कार्रवाई और निलंबन के बाद भी व्यवस्था में आखिर क्या बदला? और अगर कुछ नहीं बदला तो जवाबदेही आखिर किसकी है? और वसूली के लग रहे आरोपों की आखिर निष्पक्ष जांच कब होगी ? पिक्चर अभी बाकी है…



