रिपोर्टर :अमित शर्मा (8349348053)
दमोह/जबेरा। मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी के विधानसभा क्षेत्र में आने वाली पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर लगातार हो रहे कथित राशि आहरण को लेकर अब सवाल तेज हो गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में काम की वास्तविक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड में दर्शाए गए खर्च के बीच कथित अंतर को लेकर जांच की मांग उठ रही है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि मंत्री से निजी संबंध रखने वाले लोगों से जुड़ी पंचायतों में लगातार राशि का आहरण हो रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
इसी कड़ी में जबेरा ब्लॉक की ग्राम पंचायत डेलनखेड़ा में प्राथमिक शाला डेलनखेड़ा एवं परना के मरम्मत कार्य का मामला सामने आया है। ग्रामीणों के अनुसार, स्कूल मरम्मत के नाम पर करीब 6 लाख 35 हजार रुपये की राशि आहरित की गई, लेकिन मौके पर काम आज भी अधूरा दिखाई दे रहा है।
काम अधूरा तो 6.35 लाख का भुगतान किस आधार पर?
ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब स्कूल मरम्मत का काम पूरा नहीं हुआ तो आखिर राशि का आहरण किस आधार पर किया गया?
क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया था?
क्या तकनीकी मूल्यांकन किया गया?
क्या माप पुस्तिका यानी एमबी में कार्य की वास्तविक स्थिति दर्ज की गई?
और यदि सत्यापन हुआ था तो अधूरे कार्य को भुगतान योग्य कैसे माना गया?
इन सवालों ने पंचायत की कार्यप्रणाली के साथ-साथ तकनीकी अमले की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सरपंच-सचिव के बाद तकनीकी अमला भी सवालों में
ग्रामीणों ने सरपंच मनीषा लोधी और सचिव धनराज सिंह लोधी पर गंभीर आरोप लगाते हुए मामले की जांच की मांग की है। वहीं उपयंत्री और एसडीओ की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
ग्रामीणों का तर्क है कि निर्माण कार्यों में भुगतान से पहले तकनीकी सत्यापन और मूल्यांकन की प्रक्रिया होती है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि किस अधिकारी ने स्थल का निरीक्षण किया, किस आधार पर कार्य का मूल्यांकन किया और किसकी रिपोर्ट के बाद राशि जारी हुई।
फाइलों में स्कूल चमका या जमीन पर अधूरा काम?
मामले की असली तस्वीर सामने लाने के लिए केवल कागजी जांच नहीं, बल्कि डेलनखेड़ा और परना स्कूलों का मौके पर भौतिक सत्यापन जरूरी है। साथ ही एमबी, बिल-वाउचर, भुगतान रिकॉर्ड, तकनीकी स्वीकृति और संबंधित दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि 6.35 लाख रुपये की राशि वास्तव में किस कार्य पर और किस प्रक्रिया के तहत खर्च हुई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर काम अधूरा है तो राशि पूरी कैसे निकल गई?
और यदि रिकॉर्ड में काम पूरा दर्शाया गया है, तो जमीन पर अधूरा काम किसकी जवाबदेही तय करता है?
करोड़ों के आहरण की भी हो व्यापक जांच
डेलनखेड़ा का मामला सामने आने के बाद ग्रामीणों का कहना है कि केवल एक पंचायत की जांच से तस्वीर साफ नहीं होगी। विधानसभा क्षेत्र की पंचायतों में पिछले वर्षों में हुए बड़े निर्माण कार्यों और उनके भुगतान की भी यादृच्छिक एवं भौतिक जांच कराई जानी चाहिए।
यदि जांच में कार्यों के बिना या अधूरे कार्यों के बावजूद भुगतान की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी तय कर शासकीय राशि की वसूली और नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ 6.35 लाख रुपये का नहीं है, बल्कि यह है कि पंचायतों में सरकारी धन के आहरण की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। क्या जिम्मेदार अधिकारी रिकॉर्ड से बाहर निकलकर मौके की हकीकत देखेंगे, या फिर फाइलों में दर्ज आंकड़े ही विकास की अंतिम तस्वीर माने जाते रहेंगे?



