आजीविका मिशन में करोड़ों की अनियमितता का खुलासा, फिर भी जिम्मेदारों पर सिस्टम मेहरबान

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विभागीय जांच में वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि के बावजूद कार्रवाई ठंडे बस्ते में, जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल…
रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह। गरीब महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर संचालित मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन दमोह जिले में अब गंभीर सवालों के घेरे में है। विभागीय जांच में करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के तथ्य सामने आने के बावजूद जिम्मेदारों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना पूरे मामले को संदेहास्पद बना रहा है। जांच समिति अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है, लेकिन अब तक किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई सामने नहीं आई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस पूरे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कौन कर रहा है? जांच प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच संचालित सहारा सीएलएफ में वित्तीय नियमों की अनदेखी करते हुए करोड़ों रुपये का लेन-देन किया गया। समिति ने कई मामलों को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए अंतिम कार्रवाई के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन मामला आज भी सरकारी फाइलों में कैद दिखाई देता है।
₹1.71 करोड़ के ट्रांजेक्शन रिजेक्ट, फिर भी जिम्मेदार बेखौफ
रिपोर्ट के अनुसार सीएलएफ खाते से किए गए ₹1,71,79,700 के बैंक ट्रांजेक्शन रिजेक्ट होकर वापस लौट गए। बैंक ने ‘एडवाइस नॉट रिसीव्ड’ तथा अकाउंट ऑपरेशन में ‘ड्रॉवर सिग्नेचर’ जैसी आपत्तियां दर्ज कीं, जो वित्तीय प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही की ओर संकेत करती हैं। इसके बावजूद आज तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि इस चूक के लिए जिम्मेदार कौन था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई।
गरीब महिलाओं का ₹1.08 करोड़ दो वर्षों तक रोका गया
जांच में यह भी सामने आया कि स्व-सहायता समूहों के लिए स्वीकृत ₹1.08 करोड़ की सीआईएफ राशि दो वर्षों से अधिक समय तक वितरित ही नहीं की गई। यही नहीं, खाते में उपलब्ध राशि और वास्तविक शेष राशि के बीच लाखों रुपये का अंतर भी पाया गया, जिसका स्पष्ट हिसाब रिकॉर्ड में नहीं मिला। यह स्थिति वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
काम नहीं, फिर भी ₹10 लाख का भुगतान
जांच रिपोर्ट के अनुसार सहारा सीएलएफ द्वारा कोई आजीविका गतिविधि संचालित नहीं किए जाने के बावजूद आर्यन गारमेंट्स नामक वेंडर को ₹10 लाख का भुगतान किया गया। समिति ने इस भुगतान को नियमों के विपरीत मानते हुए गंभीर वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में रखा है।
मानदेय वितरण भी बना सवालों का केंद्र
जांच में सामने आया कि गैर-अनुबंधित सीएमआरपी के नाम पर लाखों रुपये जारी किए गए, कई ऐसे लोगों को भुगतान हुआ जिन्होंने दावा तक प्रस्तुत नहीं किया, जबकि दर्जनों पात्र सीएमआरपी को मानदेय ही नहीं मिला। सबसे हैरानी की बात यह रही कि रिकॉर्ड के अनुसार सीएलएफ से विधिवत केवल एक सीएमआरपी संबद्ध था।
नकद निकासी, डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन और अधूरे रिकॉर्ड
जांच समिति ने नकद निकासी, डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन और अध्यक्ष परिवर्तन से जुड़े रिकॉर्ड में गंभीर खामियां भी दर्ज की हैं। बैठक रजिस्टर में आवश्यक विवरण और हस्ताक्षर तक नहीं मिले, जिससे रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए।
जांच ने जिम्मेदार बताए, कार्रवाई अब भी गायब
समिति ने अपने निष्कर्ष में स्पष्ट लिखा कि संबंधित विकासखंड प्रबंधक एवं सीएलएफ प्रभारी ने मिशन के नियमों और सिद्धांतों के अनुरूप कार्य नहीं किया तथा गंभीर वित्तीय अनियमितताएं हुईं। रिपोर्ट सक्षम स्तर पर भेज दी गई, लेकिन कार्रवाई की फाइल अब तक आगे नहीं बढ़ सकी।
अब उठ रहे बड़े सवाल
करोड़ों रुपये की कथित अनियमितताओं की पुष्टि विभागीय जांच में होने के बावजूद कार्रवाई का अभाव कई सवाल छोड़ रहा है। क्या जांच रिपोर्ट केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह गई? क्या दोषियों को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है? या फिर गरीब महिलाओं के अधिकारों से जुड़े इस मामले को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? यदि जांच सही है तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यदि जांच गलत है तो उसकी जवाबदेही किसकी है? अब यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही और भ्रष्टाचार के विरुद्ध घोषित सख्त नीति की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह होगा कि जांच रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या यह मामला भी सरकारी फाइलों में हमेशा के लिए दफन होकर रह जाता है।

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