दमोह में फर्जी शिक्षकों पर कार्रवाई ठंडी क्यों? कलेक्टर सुधीर कोचर के स्पष्ट आदेश के बाद भी एफआईआर अधर में, डीईओ एस.के. नेमा की भूमिका पर गंभीर सवाल

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(रिपोर्टर अमित शर्मा 8349348053)

दमोह। शिक्षा विभाग में फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हथियाने का मामला अब सीधे प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है। करीब 40 कथित फर्जी शिक्षकों की शिकायतों के बाद दस्तावेज सत्यापन में 24 मामलों में अभिलेख संदिग्ध या फर्जी पाए जाने की पुष्टि हुई थी। इसके बाद कलेक्टर सुधीर कोचर ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि दोषियों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि आदेशों के बावजूद अब तक न तो दर्ज एफआईआर की स्पष्ट संख्या सामने आई है, न ही आरोपियों की अधिकृत सूची सार्वजनिक की गई है।
 विभागीय कार्रवाई की स्थिति भी धुंध में है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है
—क्या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?
सूत्रों के अनुसार जबेरा ब्लॉक में पदस्थ शिक्षक प्रवीण सिंघई की डीएड की कूटरचित मार्कशीट की पुष्टि हो चुकी है। वहीं शिक्षक कामता प्रसाद शुक्ला का विकलांग प्रमाण पत्र भी जांच में फर्जी पाया गया।
शिक्षक भगवान सिंह को निलंबित किया 2 वर्ष हो चुके हे मगर आगे की कार्यवाही का कुछ पता नहीं l इसके बावजूद कार्रवाई की रफ्तार सवालों के घेरे में है।
जब इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी एस.के. नेमा से संपर्क किया गया तो उन्होंने परीक्षा कार्य में व्यस्तता का हवाला देते हुए फाइल देखने के बाद जानकारी देने की बात कही। जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी का यह जवाब पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी करना केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों पर डाका है और व्यवस्था की साख पर सीधा हमला है। यदि कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं होती, तो यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर गंभीर सवाल है।
अब पूरा जिला प्रशासन कटघरे में है।
जनता जानना चाहती है—
आखिर कितने शिक्षकों पर एफआईआर दर्ज हुई?
कितनों को निलंबित किया गया?
विभागीय जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?
यदि पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला केवल फर्जी शिक्षकों का नहीं, बल्कि सिस्टम में बैठे जिम्मेदारों की जवाबदेही का बन जाएगा।

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