रिपोर्टर : अमित शर्मा (8349348053)
जबेरा/दमोह। दमोह जिले के जबेरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत डेलनखेड़ा में मनरेगा कार्यों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में कई ऐसे कार्यों के नाम पर राशि का आहरण किया गया, जो मौके पर दिखाई ही नहीं देते। इससे मनरेगा की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
बिना काम भुगतान का खेल?
मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना और गांव में स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण करना है, लेकिन डेलनखेड़ा में ग्रामीणों के आरोपों ने इस पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है। आरोप है कि जिन कार्यों का मौके पर अस्तित्व नहीं है, उनका भी मूल्यांकन कर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब काम हुआ ही नहीं तो उसका मूल्यांकन किस आधार पर हुआ और भुगतान के लिए उसे स्वीकृति कैसे मिली?
‘खाखरी’ के नाम पर लाखों का सवाल
ग्रामीणों के अनुसार पंचायत में पशु अवरोधक बाउंड्री वॉल यानी खाखरी के नाम पर कई कार्य दर्ज हैं, लेकिन इनमें से अनेक कार्य मौके पर नहीं हुए।
ग्रामीणों द्वारा जिन कार्यों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनमें—
पुलिया से तिगड्डा तक रैयतवाड़ी खाखरी
तलैया से रामसिंह के खेत तक खाखरी
श्मशान घाट पर बाउंड्री वॉल
स्कूल से चौकी तक खाखरी
घाटी से बड़े तालाब तक खाखरी
गांव से कॉलोनी तक खाखरी
बड़ी आम से कॉलोनी तक खाखरी
बड़े आम मवेशी वाली घाटी तक खाखरी
प्रधान मोहल्ला से तलैया तक खाखरी
तलैया से बड़े आम तक खाखरी
शामिल बताए जा रहे हैं।
मौके पर काम नहीं, फिर मूल्यांकन कैसे?
ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि यदि संबंधित कार्य वास्तव में धरातल पर नहीं हुए तो भौतिक सत्यापन के दौरान जिम्मेदार उपयंत्री ने क्या देखा? क्या मौके पर जाकर कार्यों की वास्तविक स्थिति जांची गई थी या फिर कागजों के आधार पर ही मूल्यांकन कर दिया गया?
यही सवाल अब उपयंत्री और एसडीओ की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर संदेह खड़े कर रहा है।
घर बैठे मूल्यांकन के आरोप, कमीशनखोरी की भी चर्चा
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि जबेरा ब्लॉक में कुछ तकनीकी अधिकारियों द्वारा मौके पर पर्याप्त भौतिक सत्यापन किए बिना मूल्यांकन किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ग्रामीणों ने कथित कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में कितनी राशि का भुगतान हुआ, कौन-कौन से कार्य हुए और किन कार्यों का भुगतान बिना निर्माण के किया गया।
सीईओ से लेकर तकनीकी अमले तक जांच की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में काम पूर्ण दिखाया गया है, जबकि मौके पर कार्य मौजूद नहीं है, तो यह केवल पंचायत स्तर का मामला नहीं रह जाता। इसमें तकनीकी मूल्यांकन, मस्टर रोल, माप पुस्तिका, जियो-टैग फोटो, भुगतान रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन की भी जांच जरूरी है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार सरपंच, सचिव, उपयंत्री, एसडीओ सहित संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों पर नियमानुसार कार्रवाई और एफआईआर दर्ज की जाए।
अब बड़ा सवाल—कागजों में बनी ‘खाखरी’ का पैसा आखिर गया कहां?
डेलनखेड़ा के ग्रामीणों के आरोपों ने मनरेगा की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अगर काम जमीन पर नहीं है तो सरकारी रिकॉर्ड में वह पूर्ण कैसे हुआ? मूल्यांकन किसने किया? भुगतान किसके आदेश पर हुआ? और यदि भुगतान हो चुका है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इन सभी आरोपो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है



