17 साल का मुकदमा, 10 साल जेल और फिर 2 भाई बरी! हाईकोर्ट ने खोली पुलिस जांच की परतें, FIR से लेकर सबूतों तक उठे गंभीर सवाल

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रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह/जबलपुर। एक हत्या का मुकदमा, 17 साल का लंबा इंतजार और करीब एक दशक जेल की सलाखों के पीछे—आखिरकार हाईकोर्ट के फैसले ने इस मामले की तस्वीर बदल दी। दमोह जिले के मड़ियादो क्षेत्र के दो सगे भाइयों को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की डिवीजन बेंच ने हत्या के मामले में दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने पुलिस जांच में गंभीर खामियां, एफआईआर की विश्वसनीयता पर सवाल और अभियोजन के साक्ष्यों में कई विरोधाभास पाए। कानूनी राहत भले ही अब मिली हो, लेकिन 17 वर्षों में परिवार ने जो खोया, उसकी भरपाई आसान नहीं है। परिवार के मुताबिक, इस मुकदमे की मार झेलते हुए तीन भाइयों में से एक मनमोहन की मौत हो गई, जबकि तुलसी और हरप्रसाद अब गांव छोड़कर दिल्ली के करोलबाग में परिवार के साथ मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं। परिवार का दावा है कि मुकदमे के खर्च और लंबे संघर्ष के चलते जमीन-जायदाद तक बिक गई।
एफआईआर पर ही खड़े हो गए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल सामने आए। अदालत ने पाया कि पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि एफआईआर आखिर किस पुलिसकर्मी ने लिखी थी। जिस अधिकारी ने एफआईआर तैयार की, उसका बयान भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया। सबसे बड़ा सवाल मृतक के अंगूठे के निशान को लेकर उठा। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि मृतक सामान्य रूप से हस्ताक्षर करता था, लेकिन एफआईआर पर अंगूठे का निशान था। हाईकोर्ट ने इस परिस्थिति को एफआईआर की विश्वसनीयता के लिए गंभीर माना और उसके तैयार किए जाने की परिस्थितियों पर सवाल उठाए।
गवाहों के बयान भी बने अभियोजन की कमजोरी
मामले में मृतक के परिजनों के बयानों में भी विरोधाभास सामने आए। बेटे के अनुसार थाने से निकलते ही पिता की मौत हो गई, जबकि पत्नी ने बताया कि अस्पताल पहुंचने तक वे जीवित थे। वहीं डॉक्टर की गवाही में उन्हें अस्पताल लाते समय ही मृत बताया गया। अदालत ने सवाल किया कि यदि मृतक एफआईआर दर्ज कराने के समय जीवित था तो उसे अस्पताल भेजे जाने का मेडिकल रेफरल रिकॉर्ड कहां है। अभियोजन इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका।
कथित हत्या के चाकू पर भी नहीं मिला खून
पुलिस द्वारा बरामद किए गए कथित हत्या के चाकू की FSL जांच में खून के निशान नहीं मिले। वहीं प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान भी घटना के तत्काल बाद दर्ज नहीं हुए, बल्कि करीब 15 से 30 दिन बाद दर्ज किए गए। अभियोजन इस देरी का ठोस कारण भी अदालत के सामने नहीं रख सका।
2009 की हत्या, 2012 में उम्रकैद और 2026 में बरी
मामला मड़ियादो थाना क्षेत्र का है। 25 अगस्त 2009 की रात करीब 8:45 बजे प्यारेलाल गड़रिया की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बालाजी मोहल्ला निवासी तुलसीराम राजपाल और उनके भाई हरप्रसाद को आरोपी बनाया गया। दमोह जिला एवं सत्र न्यायालय ने 29 जून 2012 को दोनों भाइयों को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों को संदेह से परे पर्याप्त नहीं माना और दोनों भाइयों को दोषमुक्त कर दिया।
करीब 10 साल जेल, फिर भी 17 साल मुकदमे का साया
परिवार के मुताबिक, दोनों भाइयों ने करीब 10 साल जेल में बिताए। बाद में जमानत पर बाहर आए, लेकिन मुकदमा खत्म नहीं हुआ। अदालतों के चक्कर, मुकदमे का खर्च और सामाजिक दबाव परिवार पर लगातार बना रहा। मां लक्ष्मी रानी के मुताबिक, मुकदमे के दौरान जमीन-जायदाद तक बिक गई। एक बेटा दुनिया से चला गया और दो बेटों को गांव छोड़कर दिल्ली में मजदूरी के लिए जाना पड़ा।
अब सबसे बड़ा सवाल—इन 17 वर्षों का हिसाब कौन देगा?
हाईकोर्ट के फैसले ने दो भाइयों को कानूनी राहत दे दी, लेकिन इस मामले ने पुलिस जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं। एफआईआर की प्रक्रिया से लेकर गवाहों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड और बरामद हथियार तक पर अदालत में सवाल उठे। कानून की नजर में बरी होना निश्चित रूप से बड़ी राहत है, लेकिन सवाल यह है कि यदि जांच में इतनी गंभीर खामियां थीं तो एक परिवार को 17 साल तक मुकदमे का बोझ क्यों उठाना पड़ा? जेल के साल, बिकती जमीन, गांव से पलायन और एक भाई की मौत—इन सबकी कीमत आखिर कौन चुकाएगा?

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