रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह। जिले की मध्यान्ह भोजन (एमडीएम) योजना में कथित वसूली और विभागीय दबाव का मामला अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। वर्ष 2015 में लोकायुक्त की रिश्वत संबंधी कार्रवाई, निलंबन और फिर उसी विभाग एवं कार्यालय में बहाली के बाद अब एक बार फिर एमडीएम प्रभारी समन्वयक पीएस पांडेय से जुड़े कथित वसूली के आरोपों ने विभागीय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्व-सहायता समूहों की महिलाओं के आरोपों और खबर मध्यप्रदेश 24×7 न्यूज द्वारा लगातार मामले को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद मामला शासन स्तर तक पहुंचा। शासन स्तर पर संज्ञान लिया गया, जांच के निर्देश जारी हुए और जांच टीम गठित कर मामले की पड़ताल भी कराई गई। अब देखना होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है?
2015 का लोकायुक्त ट्रैप, फिर उसी कार्यालय में वापसी
एमडीएम प्रभारी पीएस पांडेय का नाम वर्ष 2015 में भी लोकायुक्त कार्रवाई के चलते चर्चा में आया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लुहारी निवासी बलराम सिंह लोधी की शिकायत पर लोकायुक्त सागर की टीम ने कथित तौर पर 13 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए उन्हें एमडीएम कार्यालय में पकड़ा था। शिकायत में 30 हजार रुपये मांगने और बाद में 20 हजार रुपये पर सहमति बनने का आरोप लगाया गया था। इस कार्रवाई के बाद उनका निलंबन हुआ और बाद में बहाली के उपरांत वे पुनः उसी विभाग एवं कार्यालय में जिम्मेदारी संभालने लगे। हालांकि, बाद में लोकायुक्त प्रकरण में बरी किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
महिलाओं के आरोपों ने खोली कथित वसूली तंत्र की परतें
करीब एक दशक बाद एमडीएम योजना से जुड़े स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने फिर गंभीर आरोप लगाए गए थे। जिसे खबर मध्यप्रदेश 24×7 न्यूज ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था कि एमडीएम प्रभारी के वाहन चालक विनोद साहू पर विभागीय मामलों में कथित हस्तक्षेप, कार्रवाई का भय दिखाने और समूह संचालकों से पैसे मांगने के आरोप हैं। महिलाओं का आरोप था कि रकम नहीं देने पर समूह हटाने अथवा विभागीय कार्रवाई कराने का दबाव बनाया जाता था। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। इसके बावजूद महिलाओं की शिकायतों ने विभागीय निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
वाहन चालक की इतनी दखलअंदाजी, आखिर किसके भरोसे?
इस पूरे मामले में एक अहम सवाल वाहन चालक विनोद साहू की कथित भूमिका को लेकर भी है। आखिर एक वाहन चालक समूहों पर कार्रवाई और अन्य संवेदनशील प्रशासनिक मामलों में इतनी सक्रिय भूमिका कैसे निभा रहा था? क्या यह सब संबंधित अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव था? यदि वाहन चालक विभागीय अधिकारों से परे जाकर समूह संचालक महिलाओं पर दबाव बना रहा था, तो उसे रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कदम उठाए? बिना विभागीय संरक्षण अथवा अधिकारियों की जानकारी के इतनी व्यापक दखलअंदाजी कैसे संभव हुई? इन सवालों की जांच केवल वाहन चालक तक सीमित न रहकर संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही तक भी पहुंचनी चाहिए। हालांकि संरक्षण की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, यह निष्पक्ष जांच के निष्कर्षों से ही तय हो सकेगी।
खबरों के बाद शासन स्तर तक पहुंचा मामला
लगातार प्रकाशित खबरों और सामने आए आरोपों के बाद मामला शासन स्तर तक पहुंचा। यहां से मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच और आवश्यक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि एमडीएम योजना से जुड़ी शिकायतें अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं थीं। विभागीय कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर उठे सवालों पर शासन स्तर पर भी संज्ञान लिया गया।
निर्देश जारी, जांच टीम गठित; हुई पड़ताल, अब कार्रवाई की बारी
जारी निर्देशों के बाद मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई और जांच भी कराई गई। यानी जिन आरोपों को शुरुआत में समूह संचालक महिलाओं की शिकायतों के रूप में देखा जा रहा था, वे अब विभागीय जांच के दायरे में पहुंच चुके हैं। लेकिन जांच के बाद भी सबसे अहम सवाल अनुत्तरित है—क्या जांच में आरोपों की पुष्टि हुई? क्या संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए? क्या कथित वसूली, समूहों पर कार्रवाई के दबाव, वाहन चालक के विभागीय हस्तक्षेप और समूहों के संचालन से जुड़े मामलों की पड़ताल हुई? क्या जांच में अधिकारियों की भूमिका और संभावित संरक्षण के पहलू को भी शामिल किया गया? क्या समूह संचालक महिलाओं के बयान दर्ज किए गए ? यदि अनियमितताएं सामने आई हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई की स्थिति क्या है?
जांच रिपोर्ट और कार्रवाई पर टिकी निगाहें
पूरे घटनाक्रम में सामने आए आरोपों और शासन स्तर पर हुए संज्ञान तक कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अभिलेखों के आधार पर सामने आना चाहिए। जांच टीम ने किन बिंदुओं पर पड़ताल की, किसके बयान लिए, किन दस्तावेजों को आधार बनाया और जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकला—यह सब स्पष्ट होना जरूरी है। मध्यान्ह भोजन योजना का सीधा संबंध बच्चों के पोषण और सरकारी व्यवस्था पर आमजन के भरोसे से है। ऐसी संवेदनशील योजना में यदि समूह संचालक महिलाओं को कार्रवाई का भय दिखाकर कथित रूप से दबाव में लिया जा रहा था, तो यह केवल विभागीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही का गंभीर विषय है। अब सवाल सिर्फ जांच कराने का नहीं, बल्कि पूरे कथित तंत्र की जवाबदेही तय करने का है। वाहन चालक की भूमिका, संबंधित अधिकारियों की जानकारी और संभावित संरक्षण जैसे पहलुओं पर जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है। शासन स्तर पर संज्ञान और जांच टीम की पड़ताल के बाद अब देखना होगा कि रिपोर्ट में क्या तथ्य सामने आते हैं और दोषी पाए जाने वालों पर जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है?



