रिपोर्टर: अरविंद लोधी
दमोह/जबेरा। जबेरा जनपद की ग्राम पंचायत विजयसागर में मनरेगा के तहत कराए गए निर्माण कार्यों को लेकर सवालों का घेरा लगातार गहराता जा रहा है। 10 लाख रुपये की लागत से प्रस्तावित पशु अवरोधक बाउंड्री वॉल अधूरी होने के आरोप ने निर्माण की गुणवत्ता से लेकर मूल्यांकन और भुगतान प्रक्रिया तक पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकारी राशि खर्च होने के दावों के बीच मौके पर निर्माण की वास्तविक स्थिति सवालों के घेरे में है।
जानकारी के अनुसार, खाखरी मुन्ना के घर से कोपरा नाला की ओर बनाई जा रही पशु अवरोधक बाउंड्री वॉल के लिए 10 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। आरोप है कि काम पूरा हुए बिना ही मूल्यांकन और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। ऐसे में संबंधित इंजीनियर राजकरण वर्मा की भूमिका भी जांच के दायरे में है। सवाल है कि जब निर्माण अधूरा था, तो किस आधार पर उसका मूल्यांकन किया गया? क्या माप पुस्तिका (एमबी) में दर्ज कार्य और मौके पर मौजूद निर्माण का मिलान किया गया?
दो बाउंड्री वॉल के निर्माण पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2023-24 में भी इसी क्षेत्र में एक अन्य पशु अवरोधक बाउंड्री वॉल बनाई गई थी। दोनों निर्माण आमने-सामने होने के बावजूद पुरानी बाउंड्री वॉल के पत्थर तक गायब होने का आरोप लगाया जा रहा है। यदि सरकारी धन से निर्माण हुआ था, तो उसकी वर्तमान स्थिति और गायब सामग्री की जिम्मेदारी कौन लेगा?
मनरेगा की राशि में भी बंदरबांट का आरोप
मामले को और गंभीर बनाते हुए ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मनरेगा की राशि में भी गड़बड़ी की जाती थी। उनका दावा है कि सरपंच मजदूरों को महज 100 रुपये देते थे और शेष राशि खुद ले लेते थे। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और अभिलेखीय जांच होना बाकी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मजदूरों के हक और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल होगा।
CEO बोले– जानकारी नहीं थी, अब होगी कार्रवाई
मामले में जनपद पंचायत जबेरा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी रामेश्वर पटेल ने कहा, “मुझे इस संबंध में जानकारी नहीं है। आपके द्वारा मामला संज्ञान में आया है, अब कार्रवाई की जाएगी।”
अब जांच से तय होगी जिम्मेदारी
मामले में केवल कागजी जवाब नहीं, बल्कि मौके पर निष्पक्ष जांच की जरूरत है। स्वीकृति आदेश, माप पुस्तिका, मूल्यांकन रिपोर्ट, मजदूरों की उपस्थिति, बैंक भुगतान और निर्माण की वर्तमान स्थिति का मिलान कराया जाना चाहिए। साथ ही संबंधित इंजीनियर, पंचायत प्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि मनरेगा के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि निर्माण अधूरा है और मजदूरों के भुगतान में भी गड़बड़ी के आरोप हैं, तो सरकारी धन की जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा? अब निगाहें जनपद पंचायत और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।



