रिपोर्ट – शरद गर्ग (8224930713)
दमोह/जबेरा। जबेरा जनपद क्षेत्र की ग्राम पंचायत वंशीपुर में विकास कार्यों के नाम पर हुए भुगतान, बिल-वाउचर और ऑनलाइन अपलोड दस्तावेजों ने पंचायत की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। मामला केवल एक भुगतान या एक निर्माण कार्य तक सीमित नजर नहीं आता, बल्कि सत्यापन से लेकर भुगतान स्वीकृति तक पूरी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में यह चर्चा तेज है कि आखिर पंचायत में कथित अनियमितताओं का सिलसिला कैसे चल रहा है और जिम्मेदार अधिकारी इन पर नजर क्यों नहीं डाल रहे? या फिर सिस्टम की मिलीभगत से ही यह सब कार्य धड़ल्ले से जारी है ?
5 लाख का काम, धुंधली तस्वीरें और सत्यापन पर बड़ा सवाल
जानकारी के अनुसार पांचवें राज्य वित्त आयोग से ग्राम वंशीपुर में करीब 5 लाख रुपये की लागत से श्मशान घाट में सीसी सड़क एवं सौंदर्यीकरण कार्य स्वीकृत किया गया। आरोप है कि कार्य से संबंधित संदिग्ध बिलों के साथ ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसी धुंधली तस्वीरें अपलोड की गई हैं, जिनसे मौके पर हुए वास्तविक निर्माण की स्थिति तक साफ दिखाई नहीं देती। यहां सवाल बेहद सीधा है—जब तस्वीरों में काम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं है तो जिम्मेदारों ने सत्यापन किस आधार पर किया? क्या मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया गया था? क्या माप पुस्तिका में दर्ज कार्य और मौके की स्थिति का मिलान हुआ? क्या भुगतान से पहले तकनीकी अधिकारियों ने काम की गुणवत्ता और मात्रा की जांच की? यदि इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड में मौजूद हैं तो उन्हें सार्वजनिक जांच के दौरान सामने लाया जाना चाहिए। क्योंकि सरकारी राशि के भुगतान में केवल फोटो अपलोड करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
₹4.24 लाख का बिल और भुगतान प्रक्रिया पर सवाल
मामले में नमोकार छाया के बिल के माध्यम से ₹4,24,800 के भुगतान की जानकारी सामने आई है। बिल में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सामग्री किस पंचायत को उपलब्ध कराई गई। इतना ही नहीं, बिल पर प्रोप्राइटर की सील एवं हस्ताक्षर भी दिखाई नहीं दे रहे है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब बिल में ही सामग्री की आपूर्ति और प्राप्तकर्ता से जुड़े जरूरी विवरण स्पष्ट नहीं हैं, तो भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया? सामग्री वास्तव में खरीदी गई थी तो उसका रिकॉर्ड कहां है? किस पंचायत ने सामग्री प्राप्त की? स्टॉक रजिस्टर में इसकी एंट्री है या नहीं? सामग्री किस निर्माण कार्य में उपयोग हुई? इन सवालों का जवाब बिल और पंचायत के रिकॉर्ड के मिलान से आसानी से सामने आ सकता है।
‘बिल बुक पंचायत वालों को दे देते हैं’—कथित बयान ने बढ़ाई चिंता
मामले में बिल पर प्रदर्शित मोबाइल नंबर पर संपर्क किए जाने के दौरान कथित रूप से मिली जानकारी ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। संपर्क करने वाले व्यक्ति ने कथित तौर पर बताया कि बिल बुक पंचायत वालों को दे दी जाती हैं और पंचायत स्तर पर ही बिल लगा लिए जाते हैं। यदि यह दावा जांच में सही पाया जाता है तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है। क्योंकि इससे सवाल उठता है कि क्या पंचायतों में बिल पहले से उपलब्ध कराए जाते हैं और बाद में उनके आधार पर भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाती है? हालांकि इस कथित बयान की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन बिल जारी होने से लेकर सामग्री आपूर्ति और भुगतान तक पूरी प्रक्रिया की जांच इस मामले में जरूरी दिखाई देती है।
जनपद से जिला पंचायत तक निगरानी व्यवस्था पर सवाल
कथित अनियमितताओं के बीच जबेरा जनपद सीईओ रामेश्वर पटेल, एसडीओ शिवाजी गौंड और जिला पंचायत सीईओ प्रवीण फुलपगारे की निगरानी एवं सत्यापन व्यवस्था पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इन अधिकारियों पर कथित कमीशनखोरी के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा, कि वास्तविकता क्या है। यदि कार्य नियमों के अनुसार हुआ है तो एमबी, तकनीकी स्वीकृति, बिल-वाउचर, भुगतान आदेश, बैंक ट्रांजेक्शन, जीएसटी विवरण, सामग्री आपूर्ति और भौतिक सत्यापन के रिकॉर्ड से स्थिति साफ हो सकती है। यानी जांच की जाए तो सवालों का जवाब कागजों से ही मिल सकता है—काम कितना हुआ, भुगतान कितना हुआ और सरकारी राशि के बदले वास्तव में जमीन पर क्या नजर आ रहा है।
मंत्री की कथित ‘शह’ या आरोपों का राजनीतिक शोर?
मामले को लेकर स्थानीय विधायक और राज्य संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक धर्मेंद्र सिंह लोधी की कथित शह को लेकर आरोप लगाए जा रहे है। आरोप है एवं क्षेत्रीय स्तर पर चर्चाओं का बाजार गरम है, कि वंशीपुर सरपंच प्रतिनिधि डाल सिंह लोधी स्वयं को मंत्री से जुड़ा करीबी एवं रिश्तेदार बताते हैं, जिसके चलते कथित रूप से पंचायत एवं उनके ऊपर अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। हालांकि यह भी जांच का विषय है, इस दावे की भी स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यदि वास्तव में किसी राजनीतिक प्रभाव के कारण शिकायतों या जांच पर असर पड़ रहा है, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए गंभीर विषय होगा।
सवालों की फेहरिस्त लंबी, जांच कब?
अब सवाल केवल यह नहीं है कि ₹4.24 लाख का भुगतान सही है या गलत। सवाल यह भी है कि पांच लाख के श्मशान घाट कार्य का वास्तविक स्वरूप क्या है, भुगतान से पहले किसने सत्यापन किया और ऑनलाइन अपलोड तस्वीरों को किस अधिकारी ने स्वीकार किया?
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए—
– श्मशान घाट का कार्य मौके पर कितना हुआ?
– स्वीकृत पांच लाख में से कितना भुगतान किया गया?
– एमबी में दर्ज कार्य और मौके की स्थिति में कितना अंतर है?
– ₹4,24,800 के बिल की वास्तविक आपूर्ति कहां हुई?
– सामग्री किस पंचायत को दी गई और उसका रिकॉर्ड कहां है?
– बिल पर सील-साइन और आवश्यक विवरण क्यों स्पष्ट नहीं हैं?
– बिल का सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
– भुगतान की स्वीकृति किस स्तर से हुई?
– ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड तस्वीरें किसने सत्यापित कीं?
– कथित कमीशनखोरी के आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी?
अब कागज नहीं, जमीन पर चाहिए जवाब
वंशीपुर पंचायत का मामला अब कागजी दावों से आगे निकलकर जमीनी जांच की मांग कर रहा है। यदि कार्य वास्तविक है और भुगतान नियमानुसार हुआ है तो मौके के भौतिक सत्यापन से स्थिति साफ हो जाएगी। वहीं यदि दस्तावेजों और जमीन पर हुए कार्य में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग कागजी खानापूर्ति कर फाइल बंद करता है या फिर भुगतान की एक-एक परत खोलकर वास्तविकता सामने लाता है। क्योंकि सवाल सिर्फ पांच लाख के एक कार्य या ₹4.24 लाख के एक बिल का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसके तहत सरकारी राशि जारी होती है और उसके बदले जमीन पर हुए काम का सत्यापन किया जाता है। मामले में संबंधित अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।



