‌भाट खमरिया पंचायत में 35 लाख का कथित खेल! उपयंत्री राजकरण वर्मा, एसडीओ शिवाजी गौंड से लेकर जिला पंचायत सीईओ प्रवीण फुलपगारे तक सवालों के घेरे में

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दमोह/जबेरा। जबेरा जनपद क्षेत्र की ग्राम पंचायत भाट खमरिया में निर्माण कार्यों के नाम पर करीब 35 लाख रुपये की राशि आहरित होने और कई कार्यों के मौके पर नहीं होने के आरोपों ने पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक की पूरी निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कहीं पुराने घाट की तस्वीरों के आधार पर भुगतान हुआ तो कहीं लाखों रुपये निकलने के बावजूद महीनों तक निर्माण कार्य धरातल पर दिखाई नहीं दिए। मामले में उपयंत्री राजकरण वर्मा, एसडीओ शिवाजी गौंड, आरईएस/ मनरेगा से जुड़े ईई तथा जिला पंचायत सीईओ प्रवीण फुलपगारे की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही कथित कमीशनखोरी के आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। हालांकि आरोपों की वास्तविकता निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
पुराने घाट की तस्वीर, लाखों का भुगतान?
हेमराज के घर के सामने घाट निर्माण के नाम पर करीब 8.15 लाख रुपये निकाले जाने का आरोप है। ग्रामीणों का दावा है कि यहां नए निर्माण के बजाय पुराने घाट की तस्वीर का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। हनुमान मंदिर के पास घाट निर्माण के नाम पर भी करीब 8 लाख रुपये आहरित किए जाने और पुराने घाट की तस्वीर लगाए जाने का आरोप है। सवाल बेहद सीधा है—यदि निर्माण नया था तो तस्वीर पुरानी कैसे? और यदि तस्वीर सही थी तो भुगतान किस आधार पर किया गया?
नाली-सीसी के नाम पर लाखों, जमीन पर सन्नाटा!
जवाहर झरिया के घर के सामने से गांव की ओर नाली एवं सीसी रोड के लिए करीब 5.70 लाख रुपये, मंदिर से गांव की ओर सीसी एवं नाली निर्माण के लिए 7.70 लाख रुपये तथा श्मशान घाट पर सीसी निर्माण के लिए करीब 5.10 लाख रुपये आहरित किए जाने का आरोप है। ग्रामीणों के अनुसार इन कार्यों में से कई चार-पांच महीने बाद भी धरातल पर दिखाई नहीं दे रहे हैं। तो फिर सवाल उठता है—काम नहीं हुआ तो भुगतान किस आधार पर हुआ और काम हुआ तो मौके पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
9.45 लाख की सड़क और आधा काम?
नोने बाबा के घर से मेन रोड तक सीसी सड़क के लिए करीब 9.45 लाख रुपये की राशि का मामला भी सवालों में है। आरोप है कि स्वीकृत कार्य के अनुरूप पूरी सड़क बनाने के बजाय विश्वकर्मा के घर से मेन रोड तक आधी-अधूरी सीसी बनाई गई। स्वीकृति कुछ और, निर्माण कुछ और—तो फिर तकनीकी निगरानी किसकी थी?
शिकायत के बाद निर्माण शुरू—पहले भुगतान क्यों?
मामले में शिकायत और मीडिया रिपोर्टों के बाद दो सीसी निर्माण और एक घाट का काम शुरू कराए जाने की बात सामने आ रही है। ग्रामीण इन कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठा रहे हैं। यही घटनाक्रम सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है, यदि काम पहले ही पूरा दिखाया गया था तो बाद में निर्माण क्यों कराया गया? और यदि काम बाकी था तो पहले भुगतान किस आधार पर हुआ?
उपयंत्री राजकरण वर्मा और एसडीओ शिवाजी गौंड की निगरानी पर सवाल
निर्माण कार्यों की तकनीकी निगरानी से जुड़े उपयंत्री राजकरण वर्मा और एसडीओ शिवाजी गौंड की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि संबंधित कार्यों का स्थल सत्यापन कब किया गया? माप पुस्तिका में क्या दर्ज है? भुगतान से पहले वास्तविक कार्य का मिलान किसने किया? जियो-टैग तस्वीरों और मौके की स्थिति की जांच हुई या नहीं? यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है तो दस्तावेज और मौके की निष्पक्ष जांच से तस्वीर साफ हो सकती है।
आरईएस/मनरेगा के ईई की निगरानी भी सवालों में
मामले में जिला पंचायत आरईएस/मनरेगा से जुड़े कार्यपालन यंत्री (ईई) की तकनीकी निगरानी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लाखों रुपये के कार्यों का तकनीकी सत्यापन किस स्तर पर हुआ? गुणवत्ता की जांच किसने की? क्या भुगतान से पहले मौके का निरीक्षण किया गया? अगर निरीक्षण हुआ था तो कथित तौर पर काम नदारद कैसे मिला? और अगर निरीक्षण नहीं हुआ तो भुगतान की निगरानी किस आधार पर हुई?
जिला पंचायत सीईओ प्रवीण फुलपगारे से भी जवाबदेही के सवाल
मामला जिला पंचायत स्तर तक पहुंचने के बाद सीईओ प्रवीण फुलपगारे की जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया? क्या सभी कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया गया? क्या तकनीकी जांच के बाद जिम्मेदारी तय की गई? यदि शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो संरक्षण के लगाए जा रहे आरोपों की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
पांच खकरी और एक तलैया भी जांच के घेरे में
ग्रामीणों ने पांच खकरी निर्माण और एक तलैया खुदाई को भी संदिग्ध बताया है। इन कार्यों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वतंत्र टीम से मौके पर नाप-जोख और रिकॉर्ड का मिलान कराया जाना जरूरी है।
अब कागजी खानापूर्ति नहीं, मौके की खुली जांच चाहिए
भाट खमरिया का मामला अब सिर्फ एक ग्राम पंचायत के निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं रहा। यह जनपद से जिला पंचायत तक पूरे निगरानी तंत्र की परीक्षा बन चुका है। मस्टर रोल, एमबी, तकनीकी स्वीकृति, जियो-टैग फोटो, भुगतान वाउचर और मौके की नाप-जोख का मिलान कराया जाए। कथित कमीशनखोरी के आरोपों की भी स्वतंत्र जांच हो। सरकारी पैसा जनता का है। सवाल सीधा है—35 लाख रुपये निकले तो विकास जमीन पर कितना उतरा? अब गेंद जिला पंचायत प्रशासन के पाले में है। जांच होती है, जिम्मेदारी तय होती है या फिर 35 लाख का यह कथित खेल भी सरकारी फाइलों के नीचे दब जाता है—इस पर सबकी नजर है।

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