दमोह। दमोह जिले में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई के कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद विभाग कान में तेल डालकर बैठा है। एक महीने से ज्यादा समय गुजर गया, लेकिन कार्रवाई तो दूर, प्राथमिकी (FIR) तक दर्ज नहीं की गई है। इससे साफ है कि शिक्षा विभाग शासन के आदेशों और जिले के सर्वोच्च अधिकारी के निर्देशों की खुली अवहेलना कर रहा है। अब तक 24 फर्जी शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की जा चुकी हैं, लेकिन यह महज दिखावा प्रतीत होता है। इन शिक्षकों ने फर्जी प्रमाणपत्रों के दम पर सालों तक वेतन उठाया और सरकारी खजाने को चूना लगाया। इसके बावजूद आज तक न तो किसी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ, न ही वेतन की वसूली की कोई प्रक्रिया शुरू हुई है। यह सीधी-सी बात है—घोटालेबाजों को संरक्षण दिया जा रहा है।
डीईओ की भूमिका संदेह के घेरे में
सूत्रों का दावा है कि जिला शिक्षा अधिकारी एस.के. नेमा खुद इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं। विभाग के भीतर मिलीभगत की आशंका इसलिए और भी गहरी हो जाती है क्योंकि जिस तेजी से कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहां आज तक केवल चुप्पी छाई हुई है। माना जा रहा है कि डीईओ खुद कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर प्रक्रिया को टाल रहे हैं, क्योंकि फर्जी नियुक्तियों में उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
प्रशासनिक लापरवाही या संरक्षण?
कलेक्टर द्वारा साफ शब्दों में निर्देश दिए गए थे कि संबंधित फर्जी शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर वेतन व अन्य लाभों की वसूली की जाए। लेकिन शिक्षा विभाग की लापरवाही अब प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि ‘संरक्षणवाद’ की बू दे रही है। यह सवाल लाजिमी है—क्या विभाग के भीतर से ही फर्जीवाड़े को सहारा मिल रहा है?
सख्त कार्रवाई की जरूरत
जब जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई चाहता है और अधीनस्थ अधिकारी जानबूझकर टालमटोल करते हैं, तो इससे पूरे प्रशासन की साख को गहरा आघात लगता है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि मामले में निष्पक्ष जांच कर जिला शिक्षा अधिकारी सहित जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई की जाए। यह मामला अब केवल फर्जी शिक्षकों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल है। यदि अब भी प्रशासन चुप रहा, तो यह घोटाला और भी गहराएगा।




