बमनपुरा पंचायत में अधूरा भवन, पूरा आहरण, फिर जांच में राहत! पटेरा जनपद की जांच टीम की रिपोर्ट सवालों के घेरे में

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रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह/पटेरा। पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल के पूर्व संसदीय क्षेत्र दमोह में पंचायतों के निर्माण कार्यों में अनियमितताओं को लेकर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। अब जनपद पंचायत पटेरा की ग्राम पंचायत बमनपुरा के जमुनिया में करीब 25 लाख रुपए की लागत से बने सामुदायिक भवन का मामला जांच के बाद और गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायत के बाद हुई जांच में भवन को प्रगतिरत बताया गया और शेड निर्माण का कार्य शेष होने की बात स्वीकार की गई, लेकिन दूसरी ओर माप-पुस्तिका की जांच में मूल्यांकन के अनुरूप कार्य पाए जाने का उल्लेख कर दिया गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण कार्य मौके पर पूरा नहीं था और शेड का काम स्पष्ट रूप से लंबित था, तब करीब चार माह पहले निर्माण की लगभग पूरी राशि कैसे आहरित हो गई? जांच रिपोर्ट में अधूरा काम दर्ज होने के बावजूद आहरण की प्रक्रिया, भुगतान की वैधता और जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आना जांच की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
पैसा पहले निकल गया, निर्माण अब भी अधूरा
मामले का सबसे अहम पहलू राशि के आहरण और मौके पर मौजूद निर्माण के बीच दिखाई दे रहा अंतर है। जानकारी के अनुसार करीब चार माह पहले निर्माण की लगभग पूरी राशि आहरित की जा चुकी थी, लेकिन आज भी सामुदायिक भवन का शेड निर्माण लंबित बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल सीधा है—यदि कार्य की प्रगति के अनुपात में भुगतान होना था तो अधूरे निर्माण के बीच लगभग पूरी राशि का आहरण किस आधार पर हुआ? क्या भुगतान से पहले स्थल का वास्तविक भौतिक सत्यापन किया गया था? यदि किया गया था तो उस समय शेड का निर्माण अधूरा होने के बावजूद भुगतान की अनुमति किस स्तर से मिली?
जांच रिपोर्ट में शेड बाकी, फिर मूल्यांकन पूरा कैसे?
प्राप्त जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि सामुदायिक भवन का निर्माण प्रगतिरत है और शेड निर्माण का कार्य शेष है। रिपोर्ट के अनुसार ग्राम पंचायत द्वारा शेड के लिए ऑर्डर दिया गया है और शेड प्राप्त होने के बाद भवन का निर्माण पूर्ण कराया जाएगा। लेकिन इसी रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि माप-पुस्तिका की जांच करने पर जितनी राशि का मूल्यांकन किया गया, कार्य भी मूल्यांकन के अनुसार पाया गया। यहीं से जांच की गुणवत्ता पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जमीन पर शेड बाकी है, निर्माण प्रगतिरत है, लेकिन दस्तावेजी मूल्यांकन राशि के अनुरूप कार्य पूरा होने की बात सामने आ रही है। आखिर जांच टीम ने मौके की भौतिक स्थिति और आहरित राशि के बीच सामंजस्य किस आधार पर स्थापित किया?
माप-पुस्तिका बनी आधार, मौके की हकीकत कितनी जांची गई?
सरकारी निर्माण कार्यों में माप-पुस्तिका महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन केवल कागजी मूल्यांकन के आधार पर जांच पूरी मान लेना पर्याप्त है या नहीं—यह सवाल इस मामले में खासा महत्वपूर्ण है। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए था कि स्वीकृत कार्य में शेड की लागत कितनी थी, अब तक वास्तविक रूप से कितना निर्माण हुआ, कितनी राशि का भुगतान हुआ और मौके पर शेष कार्य की अनुमानित लागत कितनी है। इसके अलावा भुगतान वाउचर, कार्यादेश, तकनीकी स्वीकृति और राशि आहरण की तारीखों का भी मिलान किया गया या नहीं—इसका स्पष्ट उल्लेख जांच रिपोर्ट में नजर नहीं आता।
जांच टीम की भूमिका पर भी उठे गंभीर सवाल
मामले की संयुक्त जांच में ग्राम पंचायत बमनपुरा के उपयंत्री रोहित नायक, जनपद पंचायत पटेरा के सहायक यंत्री कमलेश चौधरी और जनपद पंचायत पटेरा के खंड पंचायत अधिकारी अंगद सिंह शामिल रहे। ऐसे में सवाल यह है कि जांच टीम ने सिर्फ माप-पुस्तिका के आधार पर निष्कर्ष निकाला या निर्माण की वास्तविक भौतिक स्थिति, भुगतान अभिलेख और राशि आहरण की पूरी प्रक्रिया को भी जांचा? यदि लगभग पूरी राशि पहले ही निकल चुकी थी और मौके पर शेड अभी बाकी था, तो इस विसंगति को जांच रिपोर्ट में प्रमुखता से दर्ज कर जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया गया? जांच का उद्देश्य सिर्फ अभिलेखों का मिलान था या सरकारी राशि के बदले वास्तविक निर्माण की स्थिति का सत्यापन भी?
मिलीभगत की चर्चाएं, लेकिन ठोस जवाबदेही कहां?
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर पंचायत के जिम्मेदारों और जांच प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बीच कथित मिलीभगत की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जांच रिपोर्ट में अधूरे निर्माण का उल्लेख होने के बावजूद राशि आहरण और भुगतान की स्थिति पर स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होने से सवाल और गहरे हो गए हैं। यदि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और व्यापक थी तो रिपोर्ट में यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि अधूरे कार्य के बावजूद लगभग पूरी राशि आहरित होने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या भुगतान प्रक्रिया की जांच की गई? क्या संबंधित पंचायत पदाधिकारियों से जवाब लिया गया? क्या आहरित राशि और वास्तविक निर्माण की लागत का स्वतंत्र मिलान किया गया?
सीईओ हलधर मिश्रा की निगरानी भी सवालों के घेरे में
जनपद पंचायत पटेरा के सीईओ हलधर मिश्रा की प्रशासनिक निगरानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पंचायतों में निर्माण कार्यों की प्रगति, गुणवत्ता, भुगतान और तकनीकी सत्यापन की निगरानी आखिर किस स्तर पर होती है, यह मामला इसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। करीब पूरी राशि आहरित होने के बाद भी शेड लंबित है, तो जनपद स्तर पर इसकी जानकारी कब मिली? क्या सीईओ स्तर से निर्माण की दोबारा जांच या भौतिक सत्यापन कराया गया? क्या संबंधित पंचायत से राशि और कार्य की स्थिति को लेकर जवाब-तलब किया गया? सूत्रों के अनुसार स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारों के संरक्षण में अनियमितताओं का सिलसिला जारी रहने जैसी चर्चाएं भी सामने आ रही हैं, हालांकि किसी अधिकारी के संरक्षण में अनियमितता सिद्ध होने संबंधी स्वतंत्र निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। इसलिए अब सवाल चर्चाओं से आगे बढ़कर दस्तावेजी जांच और जिम्मेदारी तय करने का है।
फोन किया, जवाब नहीं मिला
मामले में जनपद पंचायत पटेरा के सीईओ हलधर मिश्रा तथा जांच टीम में शामिल उपयंत्री रोहित नायक से पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन दोनों ने कॉल रिसीव नहीं किया। संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है।
अब उच्चस्तरीय जांच से सामने आनी चाहिए पूरी तस्वीर
बमनपुरा पंचायत के जमुनिया स्थित सामुदायिक भवन का मामला अब केवल शेड निर्माण लंबित होने तक सीमित नहीं है। यहां स्वीकृति, तकनीकी मूल्यांकन, माप-पुस्तिका, भुगतान, राशि आहरण, वास्तविक निर्माण और जांच रिपोर्ट—पूरी प्रक्रिया एक साथ सवालों के घेरे में है। जरूरत अब ऐसी जांच की है जिसमें सिर्फ माप-पुस्तिका के पन्ने नहीं, बल्कि मौके की वास्तविक स्थिति और बैंक/भुगतान अभिलेखों का भी मिलान किया जाए। यह भी तय हो कि लगभग पूरी राशि किस तारीख को, किस आधार पर और किस स्तर की स्वीकृति के बाद आहरित हुई। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शेड कब लगेगा। असली सवाल यह है कि जब निर्माण अधूरा था तो पैसा पहले पूरा क्यों निकल गया, अधूरे काम के बावजूद मूल्यांकन के अनुरूप कार्य कैसे माना गया और इस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?

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