दो ट्रैक्टर पकड़कर खनिज विभाग की वाहवाही, पूरे खनन खेल पर शिकंजा कब ? सीएम हेल्पलाइन शिकायतें और आरटीआई के बावजूद असली खनन स्थलों पर निर्णायक कार्रवाई का इंतजार

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रिपोर्ट – शरद गर्ग (दमोह)
दमोह। जिले में अवैध उत्खनन और खनिज के अवैध परिवहन को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं। इसी बीच प्रभारी जिला खनिज अधिकारी राजकुमार गुप्ता के नेतृत्व में दो ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पकड़ी गई हैं। एक में रेत और दूसरी में गिट्टी का अवैध परिवहन पाए जाने की बात सामने आई है। दोनों वाहनों को बांदकपुर चौकी में खड़ा कराया गया है। कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल वहीं हैं—क्या विभाग की नजर सिर्फ सड़क पर दौड़ते ट्रैक्टरों तक है या उन ठिकानों तक भी पहुंचेगी, जहां से कथित तौर पर अवैध खनिज निकाले जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं?
सवाल दो ट्रैक्टरों का नहीं, पूरे निगरानी तंत्र का
जिले में अवैध उत्खनन और परिवहन के मामले पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। शिकायतें हुईं, तस्वीरें सामने आईं और कार्रवाई की मांग उठी। इसके बावजूद कई मामलों में शिकायतों के बाद भी निर्णायक कार्रवाई को लेकर सवाल बने रहे। ऐसे में दो वाहनों की धरपकड़ के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह बड़े अभियान की शुरुआत है या कार्रवाई के आंकड़े पूरे करने तक सीमित कवायद? यदि अवैध खनन जारी है तो विभाग को यह भी बताना होगा कि खनिज निकल कहां से रहा है, कौन निकाल रहा है और विभागीय निगरानी से कैसे बच रहा है?
बरपटी से पथरिया तक—पुराने आरोपों का हिसाब कौन देगा?
पूर्व में दमोह बायपास के पास बरपटी की पहाड़ी, किल्लाई के समीप पहाड़ी, ग्राम पंचायत आनु क्षेत्र, हरदुआ मुडर के अंतर्गत खचारी पटी और पथरिया एवं पटेरा जनपद के विभिन्न इलाकों सहित जिले के अन्य स्थानों से कथित अवैध उत्खनन की शिकायतें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि इन शिकायतों पर मौके पर कितनी बार जांच हुई और जांच में क्या सामने आया? यदि शिकायतें गलत थीं तो उन्हें खारिज करने के लिए ठोस तथ्य सार्वजनिक किए जाएं। यदि सही थीं तो कार्रवाई का पूरा विवरण सामने क्यों नहीं आया? 
‘खानापूर्ति’ की चर्चाएं क्यों?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी रही है कि अवैध खनन के मामलों में कभी-कभार छोटे वाहनों पर कार्रवाई कर विभागीय रिकॉर्ड पूरा कर लिया जाता है, जबकि कथित बड़े स्रोतों और कारोबारियों तक कार्रवाई नहीं पहुंचती। इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन विभाग के सामने सवाल स्पष्ट है—यदि निगरानी प्रभावी है तो बड़े अवैध उत्खनन स्थलों पर की गई निर्णायक कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें भी बगैर संतुष्टि के बंद करने के आरोप
अवैध उत्खनन से जुड़े मामलों में सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से लगातार शिकायतें पहुंचती रही हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई मामलों में मौके पर प्रभावी कार्रवाई या वास्तविक निराकरण के बजाय विभागीय स्तर पर जवाब दर्ज कर शिकायतों को बंद कर दिया गया। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि शिकायतकर्ता की वास्तविक संतुष्टि के बिना प्रकरणों का निराकरण किस आधार पर माना गया? क्या संबंधित स्थलों का भौतिक सत्यापन किया गया, उत्खनन की जांच हुई और दोष मिलने पर चालानी कार्रवाई की गई? यदि शिकायतें सिर्फ जवाब दर्ज कर बंद कर दी गईं, तो फिर कथित अवैध उत्खनन पर रोक लगाने की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है? सीएम हेल्पलाइन के रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान अब इस पूरे मामले में अहम हो जाता है।
चार माह में महज 3 कार्रवाई, खनिज विभाग की निगरानी पर सवाल
आरटीआई दस्तावेजों के अनुसार जून से सितंबर 2026 तक खनिज विभाग की महज तीन चालानी कार्रवाई सामने आईं। 15 जून को वाहन क्रमांक ML34AA4495 से जुड़े प्रकरण में ₹16,000, 17 जुलाई को MP34ZX0925 से जुड़े प्रकरण में ₹29,500 तथा 6 अगस्त को MP21DA0367 और MP34ZG5079 से जुड़े प्रकरण में ₹49,000 की पेनल्टी जमा हुई। कुल ₹94,500 की वसूली दर्ज है। भले ही यह बारिश का सीजन रहा हो, लेकिन इसके बावजूद जिले में कथित अवैध उत्खनन का सिलसिला बीच-बीच में जारी रहने की शिकायतें सामने आती रहीं। ऐसे में चार माह में केवल तीन चालानी कार्रवाई दर्ज होना विभाग की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या बाकी मामलों में विभाग की नजर नहीं पड़ी या कार्रवाई से दूरी बनाए रखी गई? जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
कथित संरक्षण की चर्चाएं—जांच से साफ हो तस्वीर
सूत्रों के अनुसार कुछ कथित खनन कारोबारियों को प्रभावशाली लोगों का संरक्षण मिलने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यदि ऐसी चर्चाएं लगातार उठ रही हैं तो प्रशासन के पास सबसे मजबूत जवाब एक निष्पक्ष जांच है। आरोप गलत हैं तो जांच में साफ हो जाएंगे, और सही हैं तो जिम्मेदारी तय होगी।
कॉलोनियां और सड़क निर्माण—खनिज आया कहां से?
दमोह में नई कॉलोनियों का विस्तार और पथरिया क्षेत्र में सड़क निर्माण के बीच मुरम, गिट्टी और पत्थर की मांग बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यही है—इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रही खनिज सामग्री का स्रोत क्या है? क्या विभाग यह जांच रहा है कि निर्माण कार्यों में इस्तेमाल सामग्री वैध स्रोतों से खरीदी जा रही है या कथित अवैध उत्खनन से? हालांकि मामले में स्थिति निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
पहाड़ कटे तो पर्यावरण की कीमत कौन चुकाएगा?
अवैध उत्खनन का असर केवल सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं है। पहाड़ियों का कटाव प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण पर भी असर डाल सकता है। आज मुरम और पत्थर निकलेगा, कल पहाड़ी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। खनिज संपदा खत्म होने के बाद किसी जुर्माने से प्राकृतिक नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। 
अब छोटी कार्रवाई नहीं, बड़े खेल की जांच चाहिए
दो ट्रैक्टर पकड़ना कार्रवाई है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। विभाग को कथित अवैध उत्खनन स्थलों की मौके पर जांच, खनिज के स्रोत, अनुमति, रॉयल्टी, पुराने शिकायत प्रकरण और पूरे परिवहन नेटवर्क की पड़ताल करनी चाहिए। साथ ही कथित संरक्षण के आरोपों और अतिरिक्त प्रभार की अवधि में हुई कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा भी जरूरी है। सड़क पर दो ट्रैक्टर पकड़े, पहाड़ों तक कार्रवाई कब पहुंचेगी? यही सबसे बड़ा सवाल है। यदि अवैध खनन नहीं हो रहा तो शिकायतों में बताए गए स्थानों का मौके पर सत्यापन कर स्थिति स्पष्ट की जाए। और यदि खनन हो रहा है तो कार्रवाई सिर्फ वाहन तक सीमित न रहे—खनन स्थल से लेकर संचालक और पूरे नेटवर्क तक पहुंचे।
दमोह पूछता है सवाल
क्या खनिज विभाग की कार्रवाई सिर्फ ट्रैक्टर पकड़ने तक सीमित है? वरपटी, किल्लाई, आनु, खचारी पटी और पथरिया, पटेरा क्षेत्र सहित जिले भर की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कब होगी? सीएम हेल्पलाइन से उठे सवालों का वास्तविक हिसाब कौन देगा? कथित संरक्षण की चर्चाएं निराधार हैं तो जांच से स्थिति साफ क्यों नहीं की जाती? और सबसे बड़ा सवाल— दो ट्रैक्टर पकड़कर पीठ थपथपाएगा विभाग, या सचमुच अवैध खनन का पूरा खेल खंगालेगा ? जो कि आने वाले समय में देखना लाजमी होगा।

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