मनरेगा के कुओं में भुगतान का बड़ा खेल? राशि निकली, किसान अपने ही हक के पैसे के लिए भटक रहे! पटेरा जनपद की पंचायतों पर गंभीर सवाल—रिकॉर्ड में भुगतान, जमीन पर इंतजार?

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पटेरा। दमोह जिले के जनपद पंचायत पटेरा अंतर्गत ग्राम पंचायत धनगुवां, तिदनी और अन्य ग्राम पंचायतों में मनरेगा योजना के तहत निजी खेतों में बनाए गए कुओं के भुगतान को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कुओं के निर्माण के नाम पर सरकारी राशि का आहरण किया जा चुका है, लेकिन कई हितग्राही आज भी अपने हक की मजदूरी और निर्माण राशि के लिए पंचायत एवं अधिकारियों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
सवाल सीधा है—पैसा निकला तो गया कहां?
दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर के अनुसार, ग्राम धनगुवां निवासी फूल सिंह पिता दोजी सिंह के खेत में वित्तीय वर्ष 2023-24 में करीब 3.30 लाख रुपए की लागत से मनरेगा के तहत कुआं स्वीकृत किया गया था। आरोप है कि कुएं का निर्माण होने के बाद भी मजदूरी और सामग्री की पूरी राशि का भुगतान हितग्राही को नहीं मिला।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है—
सरकारी रिकॉर्ड में कितनी राशि निकाली गई?
वास्तव में हितग्राही को कितना भुगतान मिला?
बाकी रकम आखिर किसके पास गई?
क्या रिकॉर्ड में भुगतान पूरा और जमीन पर किसान खाली हाथ है?
एक नहीं, कई नामों के भुगतान पर सवाल
मनरेगा कुआं निर्माण और भुगतान से जुड़ी शिकायतों में कई हितग्राहियों के नाम सामने आ रहे हैं—
हेमराज पिता पंचम
फूल सिंह पिता दोजी सिंह
बाला पिता बासुरे
पंचम पिता सिली
लल्लू पिता गरीब यादव
इसके अलावा अन्य ग्राम पंचायतों एवं ग्राम पंचायत वाशी से भी मनरेगा कार्यों के भुगतान संबंधी शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है।
यदि इन हितग्राहियों के नाम से कुएं स्वीकृत हुए, काम हुआ और राशि पंचायत या योजना के माध्यम से आहरित की गई, तो फिर संबंधित लाभार्थियों को पूरा भुगतान क्यों नहीं मिला? यह सवाल अब केवल देरी का नहीं, बल्कि सरकारी राशि के उपयोग और भुगतान व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
किसान अपने हक के लिए क्यों बने फरियादी?
मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार और किसानों को सिंचाई जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन जब हितग्राही अपने खेत में हुए काम के भुगतान के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाए, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या पंचायतों में कागजों का खेल चल रहा है?
क्या मस्टर रोल में नाम भरकर भुगतान किसी और खाते में पहुंच गया?
क्या सामग्री भुगतान और वास्तविक खर्च में अंतर है?
क्या एमबी में दर्ज कार्य और मौके की स्थिति एक जैसी है?
इन सभी सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष और दस्तावेजी जांच से ही मिल सकता है।
मस्टर रोल से बैंक खाते तक खुलना चाहिए पूरा हिसाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन को केवल मौखिक बयान या कार्यालयीन जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक शिकायतकर्ता के मामले में निम्न रिकॉर्ड की जांच जरूरी है—
स्वीकृति आदेश और तकनीकी स्वीकृति
मस्टर रोल और श्रमिकों का वास्तविक भुगतान
सामग्री खरीदी के बिल और भुगतान विवरण
एमबी में दर्ज कार्य की माप
पंचायत एवं संबंधित खातों से हुई राशि निकासी
हितग्राही के बैंक खाते में पहुंची वास्तविक राशि
मौके पर कुएं की वास्तविक स्थिति और निर्माण लागत
रिकॉर्ड और जमीन की सच्चाई का मिलान हुआ तो पूरा खेल सामने आ सकता है।
सीईओ ने कहा—नहीं मिली राशि तो होगी जांच, अब कार्रवाई कब?
जनपद पंचायत पटेरा के सीईओ हलधर मिश्रा ने कमीशन संबंधी आरोपों को गलत बताते हुए कहा है कि यदि किसी हितग्राही को राशि नहीं मिली है तो कुआं निर्माण की जांच कराई जा सकती है।
लेकिन अब किसानों का सवाल है—जांच होगी कब?
केवल “जांच कराई जा सकती है” कह देने से उन हितग्राहियों का भुगतान नहीं होगा, जो लंबे समय से अपने ही हक की राशि का इंतजार कर रहे हैं। प्रशासन को शिकायतकर्ताओं के नामवार मामलों की जांच कर स्पष्ट करना चाहिए कि किस कुएं के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी निकाली गई और किसे कितना भुगतान मिला।
जांच में गड़बड़ी मिली तो जिम्मेदार कौन?
यदि जांच में सरकारी राशि के आहरण और वास्तविक भुगतान में अंतर मिलता है, फर्जी भुगतान या रिकॉर्ड में अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई होना चाहिए। साथ ही सबसे पहले उन किसानों और हितग्राहियों को उनका बकाया और वास्तविक हक का भुगतान मिलना चाहिए।
मनरेगा किसी की मेहरबानी नहीं, गरीब और किसान का अधिकार है।
अगर सरकारी रिकॉर्ड में पैसा निकल चुका है और हितग्राही आज भी अपनी ही राशि के लिए दर-दर भटक रहा है, तो यह सिर्फ भुगतान में देरी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।

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